दर्द को भी अब दर्द होने लगा,

जाने क्या लीख दिया उन्होंने इजतिराब में
की कासिद की लाश आए है ख़त के जवाब में.
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आप क्या समझे हमने आपको भुला रखा है,

 

आप नही जानते दील में छुपा रखा है,

 

देख न ले कोई आपको मेरी आंखों में,

 

इसलिए पलकों को झुकाए रखा है……… ..

 

हम नज़रों से दूर है,आंखों से नहीं,

 

हम ख्वाबों से दूर है,खयालो से नहीं,

 

हम दील से दूर है,धड़कन से नहीं,

 

हम आप से दूर हैं , आपकी यादों से नहीं……. .
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“दर्द को भी अब दर्द होने लगा,
दर्द ही घाव भरने लगा,
दर्द के मरे हम न रोये कभी,
दर्द ख़ुद हमको चुके रोने लगा”

 

“तू चन्द्रमुखी मैं सूरजमुखी,
तू मुझसे दुखी मैं तुझसे दुखी,
जा चाट पे जा छलांग लगा,
तू भी सुखी मैं भी सुखी”

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